देवउठान एकादशी क्यों मनाते हैं 2021 ??
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एकादशी-:भारत व्रत ,उपवास और त्योहारों का देश ह| तिथिओं के अनुसार हर दिन का एक विशेष महत्व है |ऐसी ही एक दिन है ग्यारस और एकादशी |हिन्दू पंचांग के अनुसार हर महीने दो एकादशी होती हैं |
एक शुक्ल पक्ष की और एक कृष्ण पक्ष की |अमावस से ग्यारहवीं तिथि को शुक्ल पक्ष की एकादशी ,और पूर्णिमा से ग्यारहवीं तिथि को कृष्ण पक्ष की ग्यारस कहते हैं |हर वर्ष 24 एकादशी होती हैं परन्तु जिस वर्ष अधिक मास लगता है उस वर्ष 26 एकादशी होती हैं |हर तीशरे वर्ष अधिक मास लगता है उसे मलमास भी कहते हैं |हर एकादशी का अपना महत्व है |कुछ प्रमुख एकादशी इस प्रकार हैं |निर्जला एकादशी, देवशयनी एकादशी, देवउठनी एकादशी, पापनाशिनी एकादशी आदि
एकादशी का महत्व-:स्कन्द पुराण के अनुसार एकादशी को हरी दिन,और हरी वासर के नाम दिया गया है |एकादशी व्रत 24 घंटे का होता हैएकाद्शी का व्रत जो जन पूर्ण नियम, श्रद्धा व विश्वास के साथ रखता है, उसे पुण्य, धर्म, मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस उपवास के विषय में यह मान्यता है कि इस उपवास के फलस्वरुप मिलने वाले फल अश्वमेघ यज्ञ, कठिन तपस्या, तीर्थों में स्नान-दान आदि से मिलने वाले फलों से भी अधिक होते है। यह उपवास, उपवासक का मन निर्मल करता है, शरीर को स्वस्थ करता है, ह्रदय शुद्ध करता है, तथा सदमार्ग की ओर प्रेरित करता है. तथा उपवास के पुन्यों से उसके पूर्वज मोक्ष प्राप्त करते है।
क्यों मनाते हैं एकादशी-: पूर्व काल में मुर दैत्य को मारने के लिए, भगवान विष्णु के शरीर से एक कन्या प्रकट हुई जो विष्णु के तेज से सम्पन्न और युद्धकला में निपुण थीं। उसकी हुंकार मात्र से मुर दैत्य राख का ढेर हो गया। वह कन्या ही एकादशी देवी थी। इससे प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उससे वर मांगने को कहा।एकादशी देवी ने वर मांगा—यदि आप प्रसन्न हैं तो आपकी कृपा से मैं सब तीर्थों में प्रधान, सभी विघ्नों का नाश करने वाली व समस्त सिद्धि देने वाली देवी बनूं। जो लोग उपवास (नक्त और एकभुक्त) करके मेरे व्रत का पालन करें, उन्हें आप धन, धर्म व मोक्ष प्रदान कीजिए । भगवान ने वर देते हुए कहा—ऐसा ही हो। जो तुम्हारे भक्तजन हैं वे मेरे भी भक्त कहलाएंगे।
देवउठान एकादशी-:कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को लोग दवउठनी एकादशी के नाम से जानते हैं। मान्यता है कि क्षीर सागर में चार महीने की योग निद्रा के बाद भगवान विष्णु इस दिन उठते हैं। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी देवउठनी या देव उत्थान एकादशी पर, भगवान विष्णु की पूरे विधि विधान से पूजा की जाती है। । धर्मग्रंथो के अनुसार भाद्रपद मास की शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु दैत्य संखासुर को मारा था। दैत्य और भगवान विष्ण के बीच युद्ध लम्बे समय तक चलता रहा। युद्ध समाप्त होने के बाद भगवान विष्णु बहुत ही थक गए थे और क्षीर सागर में आकर सो गए और कार्तिक की शुक्ल पक्ष की एकादशी को जागे, तब देवताओं द्वारा भगवान विष्णु का पूजन किया गया। जैसे कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की इस एकादशी को प्रबोधिनी एकादशी या देवउठनी एकादशी भी कहा जाता है।
देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी विवाह की परम्परा है। इस दिन भगवान शालिग्राम के साथ तुलसी जी का विवाह होता है, इसके पीछे एक पौराणिक कथा है। जिसमे जालंधर को हराने के लिए भगवान विष्णु ने वृंदा नामक विष्णु भक्ति के साथ छल किया था। इसके बाद वृंदा ने विष्णु जी को श्राप देकर पत्थर बना दिया, लेकिन मां लक्ष्मी की विनती के बाद उन्हें सही करके सती हो गए थे। उनकी राख से तुलसी के पौधे का जन्म हुआ और उसके साथ साथ शालिग्राम के विवाह का चल शुरू हो गया।
एकादशी व्रत कथा -:एक राजा के राज्य में सभी लोग एकादशी का व्रत रखते थे।
प्रजा तथा नौकर-चाकरों से लेकर पशुओं तक को एकादशी के
दिन अन्न नहीं दिया जाता था। एक दिन किसी दूसरे राज्य का
एक व्यक्ति राजा के पास आकर बोला महाराज! कृपा करके
मुझे नौकरी पर रख लें। तब राजा ने उसके सामने एक शर्त
रखी कि ठीक है रख लेते हैं। किन्तु रोज तो तुम्हें खाने को सब
कुछ मिलेगा पर एकादशी को अन्न नहीं मिलेगा।उस व्यक्ति ने उस समय 'हां' कर ली, पर एकादशी के दिन
जब उसे फलाहार का सामान दिया गया तो वह राजा के
सामने जाकर गिड़गिड़ाने लगा- महाराज! इससे मेरा पेट
नहीं भरेगा। मैं भूखा ही मर जाऊंगा। मुझे अन्न दे दो।
राजा ने उसे शर्त की बात याद दिलाई, पर वह अन्न छोड़ने
को राजी नहीं हुआ, तब राजा ने उसे आटा-दाल-चावल आदि
दिए। वह नित्य की तरह नदी पर पहुंचा और स्नान कर भोजन
पकाने लगा। जब भोजन बन गया तो वह भगवान को
बुलाने लगा- आओ भगवान! भोजन तैयार है। उसके बुलाने
पर पीतांबर धारण किए भगवान चतुर्भुज रूप में आ पहुंचे
और प्रेम से उसके साथ भोजन करने लगे। भोजन करके
भगवान अंतर्धान हो गए और वह अपने काम पर चला गया।
15 दिन बाद अगली एकादशी को वह राजा से कहने लगा कि
महाराज मुझे दुगुना सामान दीजिए। उस दिन तो मैं भूखा ही
रह गया। राजा ने कारण पूछा तो उसने बताया कि हमारे साथ
भगवान भी खाते हैं। इसीलिए हम दोनों के लिए ये सामान
पूरा नहीं होता।यह सुनकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ।
वह बोला मैं नहीं मान सकता कि भगवान तुम्हारे साथ खाते हैं।
मैं तो इतना व्रत रखता हूं, पूजा करता हूं, पर भगवान ने मुझे
कभी दर्शन नहीं दिए।राजा की बात सुनकर वह बोला महाराज!
यदि विश्वास न हो तो साथ चलकर देख लें। राजा एक पेड़ के
पीछे छिपकर बैठ गया। उस व्यक्ति ने भोजन बनाया
तथा भगवान को शाम तक पुकारता रहा, परंतु भगवान न आए।
अंत में उसने कहा- हे भगवान! यदि आप नहीं आए तो
मैं नदी में कूदकर प्राण त्याग दूंगा।
लेकिन भगवान नहीं आए, तब वह प्राण त्यागने के उद्देश्य से
नदी की तरफ बढ़ा। प्राण त्यागने का उसका दृढ़ इरादा जान
शीघ्र ही भगवान ने प्रकट होकर उसे रोक लिया और साथ
बैठकर भोजन करने लगे। खा-पीकर वे उसे अपने विमान में
बिठाकर अपने धाम ले गए। यह देख राजा ने सोचा कि
व्रत-उपवास से तब तक कोई फायदा नहीं होता,
जब तक मन शुद्ध न हो। इससे राजा को ज्ञान मिला।
वह भी मन से व्रत-उपवास करने लगा और अंत में स्वर्ग को प्राप्त हुआ।
देवउथवनी एकादशी व्रत आरती-:ॐ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता । विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता ।। ॐ।। तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी । गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी ।।ॐ।। मार्गशीर्ष के कृ्ष्णपक्ष की उत्पन्ना, विश्वतारनी का जन्म हुआ। शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई।। ॐ।। पौष के कृ्ष्णपक्ष की, सफला नामक है, शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा, आनन्द अधिक रहै ।। ॐ ।। नाम षटतिला माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै। शुक्लपक्ष में जया, कहावै, विजय सदा पावै ।। ॐ ।। विजया फागुन कृ्ष्णपक्ष में शुक्ला आमलकी, पापमोचनी कृ्ष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की ।। ॐ ।। चैत्र शुक्ल में नाम कामदा, धन देने वाली, नाम बरुथिनी कृ्ष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली ।। ॐ ।। शुक्ल पक्ष में होय मोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृ्ष्णपक्षी, नाम निर्जला सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी।। ॐ ।। योगिनी नाम आषाढ में जानों, कृ्ष्णपक्ष करनी। देवशयनी नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरी ।। ॐ ।। कामिका श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए। श्रावण शुक्ला होय पवित्रा आनन्द से रहिए।। ॐ ।। अजा भाद्रपद कृ्ष्णपक्ष की, परिवर्तिनी शुक्ला। इन्द्रा आश्चिन कृ्ष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला।। ॐ ।। पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी। रमा मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी ।। ॐ ।। देवोत्थानी शुक्लपक्ष की, दु:खनाशक मैया। पावन मास में करूं विनती पार करो नैया ।। ॐ ।। परमा कृ्ष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी।। शुक्ल मास में होय "पद्मिनी दु:ख दारिद्र हरनी ।। ॐ ।। जो कोई आरती एकादशी की, भक्ति सहित गावै। जन गुरदिता स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै।। ॐ ।।




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