छट पूजा ,नहाय-खाय और खरना कब 2021 ??
छट पूजा 8 नवंबर2021
नवरात्रि, दशहरा और दिवाली की तरह छठ पूजा भी हिंदुओं का प्रमुख त्योहार है। बिहार में छठ पूजा को लेकर एक अलग ही उत्साह देखने को मिलता है। छठ पूजा में सूर्य देव की उपासना की जाती है। मान्यताओं के अनुसार, छठ माता को सूर्य देवता की बहन माना जाता है। कहते हैं कि सूर्य देव की उपासना करने से छठ माई प्रसन्न होती हैं और मन की सभी मुरादें पूरी करती हैं।
छठ महापर्व पर ग्रह-गोचरों का शुभ संयोग
कार्तिक शुक्ल चतुर्थी 8 नवंबर को नहाय-खाय के साथ छठ महापर्व शुरू हो रहा है। इस बार छठ महापर्व पर ग्रह-गोचरों का शुभ संयोग बन रहा है। पारिवार की सुख-समृद्धि और मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए व्रती पूरे विधि-विधान से छठ का व्रत करेंगी। इस पर्व को करने से रोग, शोक, भय आदि से मुक्ति मिलती है। छठ व्रत करने की परंपरा ऋग्वैदिक काल से ही चला आ रहा है। वहीं मंगलवार 9 नवंबर को सायंकालीन अर्घ्य पर सर्वार्थ सिद्धि योग का संयोग बन रहा है। जबकि 10 नवंबर बुधवार को उदीयमान सूर्य को अर्घ्य पर सर्वार्थ सिद्धि योग के साथ-साथ द्विपुष्कर योग का शुभ संयोग भी बन रहा है।
- सीता, कुंती और द्रोपदी ने भी किया है छठ व्रत
अथर्ववेद में छठ व्रत के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है। छठ व्रत को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी लाभकारी माना गया है। इस व्रत के बारे में ऐसी मान्यता है कि सीता, कुंती व द्रौपदी आदि ने भी यह व्रत किया था। छठ पर्व में व्रती आसपास के नदी-तालाब में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं। जहां नदी या कोई पोखर यानी तालाब नहीं है, वहां लोग अपने घर के आगे ही साफ-सफाई करके एक गड्ढ़ा बनाते हैं और उसमें साफ जल भरते हैं, फिर व्रती उसमें खड़ा होकर सूर्य देव की अराधना करते हैं। मान्यताओं के अनुसार, छठ देवी सूर्य की बहन है। जीवन के लिए जल और सूर्य की किरणों की महत्ता को देखते हुए भगवान सूर्य की अराधना की जाती है। इस व्रत को महिला या पुरुष कोई भी कर सकता है। यह व्रत काफी कठोर माना जाता है। इसमें व्रती को खरना के दिन भगवान का प्रसाद ग्रहण करके फिर अगले दिन डूबते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद प्रात:कालीन सूर्य को अर्घ्य देकर घर पर पूजा करने के बाद प्रसाद ग्रहण करना पड़ता है।
- छठ व्रत की रोचक कथा व महत्व
सतयुग में शर्याति नाम के एक राजा थे। उनकी अनेक स्त्रियां थी, लेकिन उनकी एकमात्र संतान सुकन्या नामक पुत्री थी। राजा को अपनी पुत्री बहुत प्रिय थी। एक बार राजा शर्याति जंगल में शिकार खेलने गए। उनके साथ सुकन्या भी गईं। जंगल में च्यवन ऋषि तपस्या कर रहे थे। ऋषि तपस्या में इतने लीन थे कि उनके शरीर पर दीमक लग गई थी। बांबी से उनकी आंखें जुगनू की तरह चमक रही थीं। सुकन्या ने कौतुहलवश उन बांबी के दोनों छिद्रों में जहां ऋषि की आंखें थी, तिनके डाल दिए, जिससे मुनि की आंखें फूट गईं। क्रोधित होकर च्यवनऋषि ने श्राप दिया जिससे राजा शर्याति के सैनिकों का मल-मूत्र निकलना बंद हो गया। सैनिक दर्द से तपड़ने लगे। जब यह बात राजा शर्याति को मालूम हुई तो वह सुकन्या को लेकर च्यवनमुनि के पास क्षमा मांगने पहुंचे। राजा ने अपनी पुत्री के अपराध को देखते हुए उसे ऋषि को ही समर्पित कर दिया। सुकन्या ऋषि च्यवन के पास रहकर ही उनकी सेवा करने लगी। एक दिन कार्तिक मास में सुकन्या जल लाने के लिए पुष्करिणी के समीप गई। वहां उसे एक नागकन्या मिली। नागकन्या ने सुकन्या को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्य की उपासना एवं व्रत करने को कहा। सुकन्या ने पूरी निष्ठा से छठ का व्रत किया जिसके प्रभाव से च्यवन मुनि की आंखों की ज्योति पुन: लौट आई।






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